दूरदर्शिता के अभाव में भारत गुलाम बना था | और इसका दंश दो सौ वर्षों तक झेला इतना ही नही आज भी उस गुलामी का प्रभाव देखा जा सकता है |
आजादी में साँस लेते हुए हमें अभी ज्यादा वक्त नही गुजरा है | पर शायद हमने इतिहास से कुछ नही सीखा है या कहें हम कुछ सीखना ही नही चाहते हैं | दूसरे शब्दों में हमारी मानसिकता एक कबूतर जैसी है जो यह सोच कर अपनी आँखे बंद कर लेता है की बिल्ली उसे नही देख रही है और वह सुरक्षित है | और बिल्ली उसका कब शिकार कर लेती है उसे पता भी नही चलता है |
आ बैल मुझे मार कहावत भारतवासियों पर बिल्कुल सटीक बैठती है | हम घाव के नाशूर बनने का इंतजार करते है जबकि जब चोट लगे उसका इलाज तभी करना चाहिए कभी भी हलके नही लेना चाहिए |
आज क्षेत्रवाद तेजी से फैलता हुआ नासूर है जिसको यदि जल्दी ठीक नही किया गया तो इसका परिणाम बहुत बुरा होगा या शायद भारत शब्द ही विलुप्त हो जाए क्योंकि दरख्त कितना भी मजबूत क्यों ना हो यदि उसमे दीमक लग जाए तो फिर उसे नष्ट होने से कोई नही बचा सकता है |
आज महाराष्ट्र में जो हो रहा है वह निश्चय ही लोकतंत्र पर एक बदनुमा दाग है और भारत के संविधान को दी गई चुनौती है जो नागरिको के एक सामान अधिकार की बात करता है पर लगता है एक व्यक्ति के सामने पुरा भारत शक्तिविहीन दिख रहा है | जय जड़ हो गया हो और कुछ भी कर पाने में असमर्थ हो |
क्या देश के विरूद्व युद्घ तभी माना जाता है जब कोई बन्दूक लेकर संसद पर हमला करे | क्या महाराष्ट्र में जो हुआ और जो हो रहा है वो देश के विरूद्व युद्घ की घोषणा नही है क्या ये घटनाये हमारे संविधान को चुनौती नही दे रही है | क्या ये घटनाये ये नही कह रही है की लो तुम मेरा क्या उखाड़ लोगे दम है तो आजमा लो |
क्या देश का कानून किसी को देश का मखौल उडाने की इजाजत देता है अगर इसका जवाब इन घटनाओ को मद्देनजर रख कर दे तो जवाब हाँ में होगा |
ये हाल तब है जब उस व्यक्ति को अधिकारिक रूप से कोई प्रशासनिक अधिकार प्राप्त नही है जिस दिन उस दल के हाथो में सत्ता आ जायेगी तब क्या होगा | इसका जवाब कोई भी दे सकता है |
ऐसा लगता है की जैसे उस दल ने प्रशासन को अपनी रखैल बना छोड़ा है जो कुछ भी कर सकता है शायद यह सच भी है |
यह आग महाराष्ट्र से मध्य प्रदेश तक फ़ैल चुकी है जहाँ एक मुख्यमंत्री क्षेत्रवाद की बात करता है जो निश्चय ही डूब मरने वाली बात है |
भाषा, जाती, क्षेत्र के नाम पर राजनीती करने वालों को यदि नही रोका गया तो यह भारत को बर्बाद कर देगा और इस बर्बादी को कोई नही रोक सकता है |
क्या आजादी के लिए जान गवाने वालों ने इसी भारत की कल्पना की थी | क्या हम बर्बाद भारत को देखना चाहते है जो कई टुकरों में बँटा है पर उसका नाम भारत या हिंदुस्तान नही है बस एक क्षेत्र है जहाँ लोग अपनी करनी पर रो रहे हैं और उस दिन को कोस रहे है जिस दिन क्षेत्रवाद ने पनपना शुरू किया था और वे नींद में सोये थे |
यदि नही तो पुरे भारत को इन क्षेत्रवादियों के विरूद्व खड़ा होना होगा इनका सामूहिक बहिष्कार करना होगा | याद रखें यदि आज कुछ लोगो को क्षेत्रवाद का फ़ायदा हो रहा है तो ऐसा हमेसा नही होगा यह छणिक फ़ायदा है पर नुकशान कही ज्यादा | इसलिए ऐसे लोगो को मूल राजनीती से अलग थलग करना बहुत ही जरूरी है |
आज फिर से एक असहयोग आन्दोलन की जरूरत है उन लोगो के खिलाफ जो इसको बढ़ावा देते है |
क्या सभी तैयार है इस आन्दोलन के लिए यदि हाँ तो आज से ही शुरू कर देना चाहिए और यदि नही तैयार है तो देर सवेर इस आन्दोलन में कूदना ही पड़ेगा यदि अपना भविष्य एक सुखमय भारत में देखना चाहते है | एक आजाद भारत में |
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सोमवार, 16 नवंबर 2009
शनिवार, 25 जुलाई 2009
डा. अब्दुल कलम की तलाशी (भारत की बेइज्जती)
एक वाकया जो निश्चित रूप से भारतवासियों के लिए बड़ी शर्म की बात है| हमारे पूर्व राष्ट्रपति की कांटिनेंटल अमेरिकी एयरलाइन्स द्वारा तलाशी ली गई| एक अरब से ज्यादा की जनसँख्या वाला भारतवर्ष क्या इतना कमजोर है की वह अपने सर्वोच्च नागरिक के सम्मान की रक्षा भी नही कर सकता है | आज हम भले ही चाँद पर पहुँच जायें | पर जब हम अपने सम्मान की रक्षा नही कर सकते है तो यह सब व्यर्थ है |
अब्दुल कलम जी केवल हमारे राष्ट्रपति ही नही रहे है बल्कि युवाओं के आदर्श पुरूष भी हैं | क्या उनके साथ हुआ व्यव्हार छ्म्य है | इसका जवाब होगा नही | क्या भारतीये अधिकारी किसी देश एक पूर्व राष्ट्रपति की तलाशी लेने की हिम्मत कर सकतें है तो जवाब होगा नही |
मुझे याद है जब बिल क्लिंटन अपने कार्यकाल मैं भारत के दौरे पर आए थे | उस समय उनकी सुरक्षा मैं भारतीये जवान नही बल्कि अमेरिकी सुरक्षा कर्मी लगे थे | इसका अर्थ स्पष्ट था की अमेरिकी सुरक्षा तंत्र को भारत पर विश्वाश नही था |
भारत के प्रतिनिधियों के साथ ऐसा वाकिया पहली बार नही हुआ है | हमारे रक्षा मंत्री जार्ज फर्नाद्दिस की भी कपरे उतार कर तलाशी ली गई थी | एक स्वतंत्र देश की गरिमा का सम्मान दुसरे स्वतंत्र देश को करनी चाहिए |
यह घटना गुलामो के साथ होने वाली घटना के सामान है | इस घटना को हलके में नही लेना चाहिए | भारत सरकार को चाहिए की इसका मुखर विरोध करे | तथा इस एयरलाइन्स पर भारत में पाबंधी लगा देनी चाहिए | जो भारत का सम्मान नही कर सकता उसके लिए भारत में कोई जगह नही है |
भारत का आत्मसम्मान इतना सस्ता नही है जो किसी के हाथ की कठपुतली बन जाए | इस तरह की घटनाये निश्चित रूप से हमारे युवा विश्वाश को कम करती है और यह घटना इस बात का भी सूचक है तीसरी दुनिया का सक्तिशाली देश भारत वासत्व में कितना सक्तिशाली है |
क्या हम अपना आत्मा सम्मान बेच कर सक्तिशाली कहलाना पसंद करेंगे| जवाब है नही | क्योंकि बिना आत्म सम्मान के कोई भी सक्तिशाली या इज्जतदार नही बन सकता है |
आगे यह सवाल भारत की युवा पीढी, राजनयिक व उन सभी वर्गों पर छोड़ता हूँ जो विचारवान हैं | की हम सब को किस तरह आगे बढ़ाना है | आत्मसमान के साथ या इस के बिना?
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अब्दुल कलम जी केवल हमारे राष्ट्रपति ही नही रहे है बल्कि युवाओं के आदर्श पुरूष भी हैं | क्या उनके साथ हुआ व्यव्हार छ्म्य है | इसका जवाब होगा नही | क्या भारतीये अधिकारी किसी देश एक पूर्व राष्ट्रपति की तलाशी लेने की हिम्मत कर सकतें है तो जवाब होगा नही |
मुझे याद है जब बिल क्लिंटन अपने कार्यकाल मैं भारत के दौरे पर आए थे | उस समय उनकी सुरक्षा मैं भारतीये जवान नही बल्कि अमेरिकी सुरक्षा कर्मी लगे थे | इसका अर्थ स्पष्ट था की अमेरिकी सुरक्षा तंत्र को भारत पर विश्वाश नही था |
भारत के प्रतिनिधियों के साथ ऐसा वाकिया पहली बार नही हुआ है | हमारे रक्षा मंत्री जार्ज फर्नाद्दिस की भी कपरे उतार कर तलाशी ली गई थी | एक स्वतंत्र देश की गरिमा का सम्मान दुसरे स्वतंत्र देश को करनी चाहिए |
यह घटना गुलामो के साथ होने वाली घटना के सामान है | इस घटना को हलके में नही लेना चाहिए | भारत सरकार को चाहिए की इसका मुखर विरोध करे | तथा इस एयरलाइन्स पर भारत में पाबंधी लगा देनी चाहिए | जो भारत का सम्मान नही कर सकता उसके लिए भारत में कोई जगह नही है |
भारत का आत्मसम्मान इतना सस्ता नही है जो किसी के हाथ की कठपुतली बन जाए | इस तरह की घटनाये निश्चित रूप से हमारे युवा विश्वाश को कम करती है और यह घटना इस बात का भी सूचक है तीसरी दुनिया का सक्तिशाली देश भारत वासत्व में कितना सक्तिशाली है |
क्या हम अपना आत्मा सम्मान बेच कर सक्तिशाली कहलाना पसंद करेंगे| जवाब है नही | क्योंकि बिना आत्म सम्मान के कोई भी सक्तिशाली या इज्जतदार नही बन सकता है |
आगे यह सवाल भारत की युवा पीढी, राजनयिक व उन सभी वर्गों पर छोड़ता हूँ जो विचारवान हैं | की हम सब को किस तरह आगे बढ़ाना है | आत्मसमान के साथ या इस के बिना?
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बुधवार, 31 दिसंबर 2008
Happy New Year 2009
मिथिलामैथिल के सभी पाठकों को नव वर्ष की हार्दिक बधाई |
आने वाला वर्ष ढेरों खुशियाँ और शान्ति लेकर आए | निश्चित रूप से यही कामना हम सभी करते हैं | पर क्या २००८ को अलविदा कहना इतना आसान है | अगर यह कहूँ नही तो कोई बड़ी बात नही होगी | क्यों की इस वर्ष में हमने जहाँ कुछ उप्लाधियाँ प्राप्त की हैं वही कुच्छ घटनायों ने हमें झकझोर दिया | आज हम कहतें है की दुनिया बहुत छोटी हो गई है पर हमने अपने ही घर में कदमो को दूरियां नापते देखा है | अपने शहर को पराया बनते देखा है निश्चित रूप से इस तरह की घटनाएँ लोकतंत्र के लिए अच्छी बात नही | कहतें हैं हम सब एक हैं तो फिर कब से हम पूरव और पश्चिम में बटने लगे | क्या हम अपने ही देश में अंतर्राष्ट्रीय सीमा बनाने लगे है |
नही ऐसा नही है पर यदि हमने तुच्छ राजनीती के तुस्टीकरण को नही बंद किया तो ऐसा होते देर नही लगेगा | फिर भारत नए पाकिस्तान और बांग्लादेश में बाँट जाएगा | यही भूल १९४७ में हुई थी जिसका खामियाजा आज तक भोग रहें है | हमें सोचना होगा की क्या हम एकीकृत भारत का विकास और खुशहाली चाहते हैं या टुकरों में बटे भारत का | यदि आज हमने अपनी इच्छाशक्ति नही दिखाई तो शायद आने वाले समय में केवल ख़ुद को कोसते हुए पाएंगे | क्या हम ऐसा चाहते है नही कदापि भी नही |
२००८ में दिल्ली में बम विष्फोट मुंबई में आतंकी हमला जिश्न्ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद पर फिर से सोचने को मजबूर कर दिया है निश्चित रूपसे अब आतंक के खिलाफ करे कदम उठाने का समय आ गया है इसके लिए अब हमें किसी का मुँह नही देखना चाहिए | क्योंकि यह हमला हमारी संप्रभुता पर है याद है वर्ल्ड ट्रेड टावर पर हमले के बाद अमेरिका ने किसी की नही सुनी और उसने बगदाद पर हमला बोल दिया | अपनी रक्षा में उठाया गया हर कदम जायज होता है यही बात अमेरिका ने बतानी चाही थी |
इस हमले में हमने अपने हेमंत करकरे जैसे कई जाबांज सिपाही खो दिए | आतंकवाद का खात्मा ही उनको हमारी सच्ची श्रधांजलि होगी |
२००८ में हमने बहुत सी उपलब्धियां भी प्राप्त की मसलन बीजिंग ओल्य्म्पिक्स में पहली बार तीन पदक हाशिल किए वहीं हम चाँद पर भी चंद्रयान भेजने में सफल रहे जो हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि है | आज जहाँ विश्व मंदी के दौर से गुजर रहा है वाही हम अभी मजबूत दिखाई दे रहे हैं | उमीद यही करतें है की आने वाले वर्ष में हम यूँ ही तरकी करते रहें |
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आने वाला वर्ष ढेरों खुशियाँ और शान्ति लेकर आए | निश्चित रूप से यही कामना हम सभी करते हैं | पर क्या २००८ को अलविदा कहना इतना आसान है | अगर यह कहूँ नही तो कोई बड़ी बात नही होगी | क्यों की इस वर्ष में हमने जहाँ कुछ उप्लाधियाँ प्राप्त की हैं वही कुच्छ घटनायों ने हमें झकझोर दिया | आज हम कहतें है की दुनिया बहुत छोटी हो गई है पर हमने अपने ही घर में कदमो को दूरियां नापते देखा है | अपने शहर को पराया बनते देखा है निश्चित रूप से इस तरह की घटनाएँ लोकतंत्र के लिए अच्छी बात नही | कहतें हैं हम सब एक हैं तो फिर कब से हम पूरव और पश्चिम में बटने लगे | क्या हम अपने ही देश में अंतर्राष्ट्रीय सीमा बनाने लगे है |
नही ऐसा नही है पर यदि हमने तुच्छ राजनीती के तुस्टीकरण को नही बंद किया तो ऐसा होते देर नही लगेगा | फिर भारत नए पाकिस्तान और बांग्लादेश में बाँट जाएगा | यही भूल १९४७ में हुई थी जिसका खामियाजा आज तक भोग रहें है | हमें सोचना होगा की क्या हम एकीकृत भारत का विकास और खुशहाली चाहते हैं या टुकरों में बटे भारत का | यदि आज हमने अपनी इच्छाशक्ति नही दिखाई तो शायद आने वाले समय में केवल ख़ुद को कोसते हुए पाएंगे | क्या हम ऐसा चाहते है नही कदापि भी नही |
२००८ में दिल्ली में बम विष्फोट मुंबई में आतंकी हमला जिश्न्ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद पर फिर से सोचने को मजबूर कर दिया है निश्चित रूपसे अब आतंक के खिलाफ करे कदम उठाने का समय आ गया है इसके लिए अब हमें किसी का मुँह नही देखना चाहिए | क्योंकि यह हमला हमारी संप्रभुता पर है याद है वर्ल्ड ट्रेड टावर पर हमले के बाद अमेरिका ने किसी की नही सुनी और उसने बगदाद पर हमला बोल दिया | अपनी रक्षा में उठाया गया हर कदम जायज होता है यही बात अमेरिका ने बतानी चाही थी |
इस हमले में हमने अपने हेमंत करकरे जैसे कई जाबांज सिपाही खो दिए | आतंकवाद का खात्मा ही उनको हमारी सच्ची श्रधांजलि होगी |
२००८ में हमने बहुत सी उपलब्धियां भी प्राप्त की मसलन बीजिंग ओल्य्म्पिक्स में पहली बार तीन पदक हाशिल किए वहीं हम चाँद पर भी चंद्रयान भेजने में सफल रहे जो हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि है | आज जहाँ विश्व मंदी के दौर से गुजर रहा है वाही हम अभी मजबूत दिखाई दे रहे हैं | उमीद यही करतें है की आने वाले वर्ष में हम यूँ ही तरकी करते रहें |
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गुरुवार, 9 अक्टूबर 2008
Vijaya Dhashmi
आज विजयदशमी है। हर साल की तरह इस साल भी रावन के पुतले को जलाया गया | पर क्या वास्तव में रावण जल गया | क्या हमने बुराई पर विजय प्राप्त कर ली| क्या किया हमने रावण के पुतले को जला कर | क्या कोई उत्तर है शायद नही | यदि है तो वह केवल बात के सिवाय कुछ भी नही | क्यूँ की बुराई हम सब में है | दूसरे को बुरा कहना आसान है पर स्वयम के लिए बुरा नही सुन सकते है| हम भ्रस्टाचार की बात करतें हैं | पर बढ़ावा भी हम स्वयम देतें हैं | वास्तव में बुराई पर लिखना आसान है | पर दूर करना उतना ही मुश्किल | क्यूंकि भ्रस्टाचार सभ्य समाज का अभिन्न अंग बनता जा रहा है जिसे हम अपने बच्चों को संस्कार की तरह विरासत में देने जा रहे हैं | अच्छी शिक्षा के नाम पर डोनेशन देना भी इसी बुराई का अंग है पर क्या करें बच्चे के भविष्य का सवाल है यदि डोनेशन नही दिया तो बच्चे को अच्छी शिक्षा कहाँ से मिलेगी | अब अगर डोनेशन देना है और इतनी आमदनी नही है की डोनेशन दिया जा सके तो कुछ उल्टे सीधे काम तो करने ही पड़ेगे |
इधर यह मानसिकता बनती जा रही है की यदि पैसे देकर काम बन रहा है तो हम अपना समय क्यूँ बर्बाद करें | आप सही हैं फिर भी आपको अपने काम के लिए जेब तो ढीली करनी ही होगी क्यूँ की आप अगर नही इस बुराई के भागीधर बनाना चाहते हैं तो आप से आगे या पीछे खड़े लोग बनने को तैयार हैं | तब हरे को हरिनाम वाली कहावत सत्य होगी और आपको भी इस का हिस्सा बनाना पड़ेगा |
यह तो मैंने एक तरह के विषय पर कही है ऐसी कितनी ही विषय है जिन पर कहना बांकी है| इस तरह हम रावन को कैसे जला सकते है जब हम में जिन्दा रावणों से लड़ने की हिम्मत जवाब देने लगती है| यदि कोई उत्तर है तो अवश्य बताएं|
इधर यह मानसिकता बनती जा रही है की यदि पैसे देकर काम बन रहा है तो हम अपना समय क्यूँ बर्बाद करें | आप सही हैं फिर भी आपको अपने काम के लिए जेब तो ढीली करनी ही होगी क्यूँ की आप अगर नही इस बुराई के भागीधर बनाना चाहते हैं तो आप से आगे या पीछे खड़े लोग बनने को तैयार हैं | तब हरे को हरिनाम वाली कहावत सत्य होगी और आपको भी इस का हिस्सा बनाना पड़ेगा |
यह तो मैंने एक तरह के विषय पर कही है ऐसी कितनी ही विषय है जिन पर कहना बांकी है| इस तरह हम रावन को कैसे जला सकते है जब हम में जिन्दा रावणों से लड़ने की हिम्मत जवाब देने लगती है| यदि कोई उत्तर है तो अवश्य बताएं|
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