मच्छरों का गीत गाना भले ही आपको पसंद ना हो लेकिन ये इनके प्रेम गीत है जिससे ये अपने साथी को लुभाने का प्रयास करतें हैं।
एक अध्यन के मुताबिक अपने गायकी के हुनर से ये सम्भोग करने के लिए सही साथी कि तलाश कर रहे होते हैं ।
मेडवे स्थित ग्रीनविच यूनीवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने पाया कि हवा में अपने पंख फाड़फड़ा कर मच्छर यह सुर निकलते हैं । अध्यन दल का नेतृत्व करने वाले गेबरीला गिब्सन ने बताया, 'हमारे अध्ययन में इस बात का पता चला है कि मच्छर सही प्रजातियों के साथी को आकर्षित करने के ध्वनि पर निर्भर होते हैं । ससेक्स विश्वविद्यालय के अध्यानकर्ता गिब्सन और रसेल ने बताया कि एनोफिलीज गैम्बियेन मच्छरों में आनुवांशिक विविधता होती है । दो मच्छर यदि एक ही लिंग के होते हैं तो दोनों का सुर नही मिल पता है।
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शनिवार, 2 जनवरी 2010
कित्रिम धमनी, बायपास सर्जरी में क्रांति
वैज्ञानिकों ने एक कृतिम धमनी विकसित कर ली है जो सेवई के छोटे टुकरों से मिलती जुलती है । वैज्ञानिकों का दावा है कि यह आपरेशन के दौरान दिल के दौरे के खतरे को कम कर देगी।
यह एक ऐसी प्रगति है, जिससे बायपास सर्जरी में क्रांति आ सकती है। इस शोध के लिए ब्रितानी दल का नेतृत्व कर रहे यूनिवर्सिटी कालेज ऑफ़ लन्दन के प्रोफेसर एलेक्जेंडर सिफालीयन ने बताया है कि जिन मरीजों को बायपास सर्जरी कि जरूरत होती है, उनमे से करीब ३० प्रतिशत के पास उचित शिरा नही होती जिसका वे इस्तेमाल कर सकें।
इन मामलों में चिकित्सकों के लिए ज्यादा कुछ करने को नही होता और अक्सर मरीजों कि मौत हो जाती है । अतः हमने सूक्ष्म प्रोद्योगिकी का इस्तेमाल कर कृत्रिम धमनी विकसित कर ली है।
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यह एक ऐसी प्रगति है, जिससे बायपास सर्जरी में क्रांति आ सकती है। इस शोध के लिए ब्रितानी दल का नेतृत्व कर रहे यूनिवर्सिटी कालेज ऑफ़ लन्दन के प्रोफेसर एलेक्जेंडर सिफालीयन ने बताया है कि जिन मरीजों को बायपास सर्जरी कि जरूरत होती है, उनमे से करीब ३० प्रतिशत के पास उचित शिरा नही होती जिसका वे इस्तेमाल कर सकें।
इन मामलों में चिकित्सकों के लिए ज्यादा कुछ करने को नही होता और अक्सर मरीजों कि मौत हो जाती है । अतः हमने सूक्ष्म प्रोद्योगिकी का इस्तेमाल कर कृत्रिम धमनी विकसित कर ली है।
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सोमवार, 16 नवंबर 2009
क्षेत्रवाद भारत की संप्रभुता को खतरा
दूरदर्शिता के अभाव में भारत गुलाम बना था | और इसका दंश दो सौ वर्षों तक झेला इतना ही नही आज भी उस गुलामी का प्रभाव देखा जा सकता है |
आजादी में साँस लेते हुए हमें अभी ज्यादा वक्त नही गुजरा है | पर शायद हमने इतिहास से कुछ नही सीखा है या कहें हम कुछ सीखना ही नही चाहते हैं | दूसरे शब्दों में हमारी मानसिकता एक कबूतर जैसी है जो यह सोच कर अपनी आँखे बंद कर लेता है की बिल्ली उसे नही देख रही है और वह सुरक्षित है | और बिल्ली उसका कब शिकार कर लेती है उसे पता भी नही चलता है |
आ बैल मुझे मार कहावत भारतवासियों पर बिल्कुल सटीक बैठती है | हम घाव के नाशूर बनने का इंतजार करते है जबकि जब चोट लगे उसका इलाज तभी करना चाहिए कभी भी हलके नही लेना चाहिए |
आज क्षेत्रवाद तेजी से फैलता हुआ नासूर है जिसको यदि जल्दी ठीक नही किया गया तो इसका परिणाम बहुत बुरा होगा या शायद भारत शब्द ही विलुप्त हो जाए क्योंकि दरख्त कितना भी मजबूत क्यों ना हो यदि उसमे दीमक लग जाए तो फिर उसे नष्ट होने से कोई नही बचा सकता है |
आज महाराष्ट्र में जो हो रहा है वह निश्चय ही लोकतंत्र पर एक बदनुमा दाग है और भारत के संविधान को दी गई चुनौती है जो नागरिको के एक सामान अधिकार की बात करता है पर लगता है एक व्यक्ति के सामने पुरा भारत शक्तिविहीन दिख रहा है | जय जड़ हो गया हो और कुछ भी कर पाने में असमर्थ हो |
क्या देश के विरूद्व युद्घ तभी माना जाता है जब कोई बन्दूक लेकर संसद पर हमला करे | क्या महाराष्ट्र में जो हुआ और जो हो रहा है वो देश के विरूद्व युद्घ की घोषणा नही है क्या ये घटनाये हमारे संविधान को चुनौती नही दे रही है | क्या ये घटनाये ये नही कह रही है की लो तुम मेरा क्या उखाड़ लोगे दम है तो आजमा लो |
क्या देश का कानून किसी को देश का मखौल उडाने की इजाजत देता है अगर इसका जवाब इन घटनाओ को मद्देनजर रख कर दे तो जवाब हाँ में होगा |
ये हाल तब है जब उस व्यक्ति को अधिकारिक रूप से कोई प्रशासनिक अधिकार प्राप्त नही है जिस दिन उस दल के हाथो में सत्ता आ जायेगी तब क्या होगा | इसका जवाब कोई भी दे सकता है |
ऐसा लगता है की जैसे उस दल ने प्रशासन को अपनी रखैल बना छोड़ा है जो कुछ भी कर सकता है शायद यह सच भी है |
यह आग महाराष्ट्र से मध्य प्रदेश तक फ़ैल चुकी है जहाँ एक मुख्यमंत्री क्षेत्रवाद की बात करता है जो निश्चय ही डूब मरने वाली बात है |
भाषा, जाती, क्षेत्र के नाम पर राजनीती करने वालों को यदि नही रोका गया तो यह भारत को बर्बाद कर देगा और इस बर्बादी को कोई नही रोक सकता है |
क्या आजादी के लिए जान गवाने वालों ने इसी भारत की कल्पना की थी | क्या हम बर्बाद भारत को देखना चाहते है जो कई टुकरों में बँटा है पर उसका नाम भारत या हिंदुस्तान नही है बस एक क्षेत्र है जहाँ लोग अपनी करनी पर रो रहे हैं और उस दिन को कोस रहे है जिस दिन क्षेत्रवाद ने पनपना शुरू किया था और वे नींद में सोये थे |
यदि नही तो पुरे भारत को इन क्षेत्रवादियों के विरूद्व खड़ा होना होगा इनका सामूहिक बहिष्कार करना होगा | याद रखें यदि आज कुछ लोगो को क्षेत्रवाद का फ़ायदा हो रहा है तो ऐसा हमेसा नही होगा यह छणिक फ़ायदा है पर नुकशान कही ज्यादा | इसलिए ऐसे लोगो को मूल राजनीती से अलग थलग करना बहुत ही जरूरी है |
आज फिर से एक असहयोग आन्दोलन की जरूरत है उन लोगो के खिलाफ जो इसको बढ़ावा देते है |
क्या सभी तैयार है इस आन्दोलन के लिए यदि हाँ तो आज से ही शुरू कर देना चाहिए और यदि नही तैयार है तो देर सवेर इस आन्दोलन में कूदना ही पड़ेगा यदि अपना भविष्य एक सुखमय भारत में देखना चाहते है | एक आजाद भारत में |
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आजादी में साँस लेते हुए हमें अभी ज्यादा वक्त नही गुजरा है | पर शायद हमने इतिहास से कुछ नही सीखा है या कहें हम कुछ सीखना ही नही चाहते हैं | दूसरे शब्दों में हमारी मानसिकता एक कबूतर जैसी है जो यह सोच कर अपनी आँखे बंद कर लेता है की बिल्ली उसे नही देख रही है और वह सुरक्षित है | और बिल्ली उसका कब शिकार कर लेती है उसे पता भी नही चलता है |
आ बैल मुझे मार कहावत भारतवासियों पर बिल्कुल सटीक बैठती है | हम घाव के नाशूर बनने का इंतजार करते है जबकि जब चोट लगे उसका इलाज तभी करना चाहिए कभी भी हलके नही लेना चाहिए |
आज क्षेत्रवाद तेजी से फैलता हुआ नासूर है जिसको यदि जल्दी ठीक नही किया गया तो इसका परिणाम बहुत बुरा होगा या शायद भारत शब्द ही विलुप्त हो जाए क्योंकि दरख्त कितना भी मजबूत क्यों ना हो यदि उसमे दीमक लग जाए तो फिर उसे नष्ट होने से कोई नही बचा सकता है |
आज महाराष्ट्र में जो हो रहा है वह निश्चय ही लोकतंत्र पर एक बदनुमा दाग है और भारत के संविधान को दी गई चुनौती है जो नागरिको के एक सामान अधिकार की बात करता है पर लगता है एक व्यक्ति के सामने पुरा भारत शक्तिविहीन दिख रहा है | जय जड़ हो गया हो और कुछ भी कर पाने में असमर्थ हो |
क्या देश के विरूद्व युद्घ तभी माना जाता है जब कोई बन्दूक लेकर संसद पर हमला करे | क्या महाराष्ट्र में जो हुआ और जो हो रहा है वो देश के विरूद्व युद्घ की घोषणा नही है क्या ये घटनाये हमारे संविधान को चुनौती नही दे रही है | क्या ये घटनाये ये नही कह रही है की लो तुम मेरा क्या उखाड़ लोगे दम है तो आजमा लो |
क्या देश का कानून किसी को देश का मखौल उडाने की इजाजत देता है अगर इसका जवाब इन घटनाओ को मद्देनजर रख कर दे तो जवाब हाँ में होगा |
ये हाल तब है जब उस व्यक्ति को अधिकारिक रूप से कोई प्रशासनिक अधिकार प्राप्त नही है जिस दिन उस दल के हाथो में सत्ता आ जायेगी तब क्या होगा | इसका जवाब कोई भी दे सकता है |
ऐसा लगता है की जैसे उस दल ने प्रशासन को अपनी रखैल बना छोड़ा है जो कुछ भी कर सकता है शायद यह सच भी है |
यह आग महाराष्ट्र से मध्य प्रदेश तक फ़ैल चुकी है जहाँ एक मुख्यमंत्री क्षेत्रवाद की बात करता है जो निश्चय ही डूब मरने वाली बात है |
भाषा, जाती, क्षेत्र के नाम पर राजनीती करने वालों को यदि नही रोका गया तो यह भारत को बर्बाद कर देगा और इस बर्बादी को कोई नही रोक सकता है |
क्या आजादी के लिए जान गवाने वालों ने इसी भारत की कल्पना की थी | क्या हम बर्बाद भारत को देखना चाहते है जो कई टुकरों में बँटा है पर उसका नाम भारत या हिंदुस्तान नही है बस एक क्षेत्र है जहाँ लोग अपनी करनी पर रो रहे हैं और उस दिन को कोस रहे है जिस दिन क्षेत्रवाद ने पनपना शुरू किया था और वे नींद में सोये थे |
यदि नही तो पुरे भारत को इन क्षेत्रवादियों के विरूद्व खड़ा होना होगा इनका सामूहिक बहिष्कार करना होगा | याद रखें यदि आज कुछ लोगो को क्षेत्रवाद का फ़ायदा हो रहा है तो ऐसा हमेसा नही होगा यह छणिक फ़ायदा है पर नुकशान कही ज्यादा | इसलिए ऐसे लोगो को मूल राजनीती से अलग थलग करना बहुत ही जरूरी है |
आज फिर से एक असहयोग आन्दोलन की जरूरत है उन लोगो के खिलाफ जो इसको बढ़ावा देते है |
क्या सभी तैयार है इस आन्दोलन के लिए यदि हाँ तो आज से ही शुरू कर देना चाहिए और यदि नही तैयार है तो देर सवेर इस आन्दोलन में कूदना ही पड़ेगा यदि अपना भविष्य एक सुखमय भारत में देखना चाहते है | एक आजाद भारत में |
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मंगलवार, 3 नवंबर 2009
सोमवार, 2 नवंबर 2009
ख़राब ड्राइविंग के लिए जीन जिम्मेदार
यदि आप किसी को ख़राब ड्राइविंग करते देखतें है तो इसमे बेचारे उस व्यक्ति का दोष नही है बल्कि इसके लिए उसका जीन जिमेदार है |
एक रिसर्च में यह पाया गया है की एक विशेष प्रकार के जीन के व्यक्ति २०% ख़राब ड्राइविंग करतें है उनके मुकाबले जिनके जीन अलग है |
अमेरिका में एक अध्यन किया गया की लोग ख़राब ड्राइविंग क्यों करतें है | अमेरिका में लगभग ३०% लोग में संस्करण जीन हैं
ये लोग ज्यादा गलती करतें है | ये समय गुजरने के साथ ही ये भूल जातें है की उन्होंने क्या सीखा था |
डॉ स्तेवें क्रेमर जो इस अध्यन के अगुवा हैं ने ये बात कही है |
क्रेमर और इनके साथियों ने २९ लोगों पर यह प्रयोग किया इनमे से २२ अलग प्रकार के जीन के थे और बाकि अलग|
जब इन को के विशेष प्रकार से ड्राइविंग करने के लिए कहा गया और इसको एक सप्ताह बाद फिर दोहराने के लिए कहा गया तो यह देख कर हैरान रह गए की उत्परिवर्ती जीन के लोगो ने ज्यादा गलती की|
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एक रिसर्च में यह पाया गया है की एक विशेष प्रकार के जीन के व्यक्ति २०% ख़राब ड्राइविंग करतें है उनके मुकाबले जिनके जीन अलग है |
अमेरिका में एक अध्यन किया गया की लोग ख़राब ड्राइविंग क्यों करतें है | अमेरिका में लगभग ३०% लोग में संस्करण जीन हैं
ये लोग ज्यादा गलती करतें है | ये समय गुजरने के साथ ही ये भूल जातें है की उन्होंने क्या सीखा था |
डॉ स्तेवें क्रेमर जो इस अध्यन के अगुवा हैं ने ये बात कही है |
क्रेमर और इनके साथियों ने २९ लोगों पर यह प्रयोग किया इनमे से २२ अलग प्रकार के जीन के थे और बाकि अलग|
जब इन को के विशेष प्रकार से ड्राइविंग करने के लिए कहा गया और इसको एक सप्ताह बाद फिर दोहराने के लिए कहा गया तो यह देख कर हैरान रह गए की उत्परिवर्ती जीन के लोगो ने ज्यादा गलती की|
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मंगलवार, 6 अक्टूबर 2009
शाइनी आहूजा का शाइन(चमक)
भाई ! लोगो को तो अच्छे काम करके भी इतनी ख्याति नही मिलती है जितनी शाइनी आहूजा को बलात्कार के आरोप के बात मिली है | वाह क्या बात है एक नई कहावत बनने जा रही है बुरे का बोलबाला और अच्छे का मुंह काला |
इस तरह के कृत्य के लिए जहाँ भर्त्सना होनी चाहिए वही वह कहाँ गया क्या खा रहा है क्या पी रहा है यहाँ तक की वह सुबह बाथरूम में क्या करता है उसकी भी ख़बर मिल जाए तो वह भी कम है वो भी फोटो के साथ |
इस तरह की बातों से उसका कोई नुकसान नही होने वाला है बल्कि इससे उसकी मार्केट वैल्यू बढेगी और हो सकता है की कोई और शाइनी आहूजा कल हमारे सामने खड़ा हो |
यह एक सोचनिये विषय है की जहाँ हम महिलाओ की सुरक्षा की बात करते है वहां क्या इस तरह की बातें महिलाओं में असुरक्षा की भावना नही पैदा करती हैं |
क्या हम वास्तव में ऐसे कार्यों को सामाजिक बुराई मानते है यदि ऐसा होता तो मीडिया शाइनी को लेकर इसतरह कसीदें नही पढता |
इसतरह का प्रचार इस बुराई को दूर नही बल्कि इससे और भयानक बना देगा |
पर मीडिया की भी मज़बूरी है क्योंकि जो बिकता है वही दिखता बांकी सब जाए भाड़ में |
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इस तरह के कृत्य के लिए जहाँ भर्त्सना होनी चाहिए वही वह कहाँ गया क्या खा रहा है क्या पी रहा है यहाँ तक की वह सुबह बाथरूम में क्या करता है उसकी भी ख़बर मिल जाए तो वह भी कम है वो भी फोटो के साथ |
इस तरह की बातों से उसका कोई नुकसान नही होने वाला है बल्कि इससे उसकी मार्केट वैल्यू बढेगी और हो सकता है की कोई और शाइनी आहूजा कल हमारे सामने खड़ा हो |
यह एक सोचनिये विषय है की जहाँ हम महिलाओ की सुरक्षा की बात करते है वहां क्या इस तरह की बातें महिलाओं में असुरक्षा की भावना नही पैदा करती हैं |
क्या हम वास्तव में ऐसे कार्यों को सामाजिक बुराई मानते है यदि ऐसा होता तो मीडिया शाइनी को लेकर इसतरह कसीदें नही पढता |
इसतरह का प्रचार इस बुराई को दूर नही बल्कि इससे और भयानक बना देगा |
पर मीडिया की भी मज़बूरी है क्योंकि जो बिकता है वही दिखता बांकी सब जाए भाड़ में |
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रविवार, 4 अक्टूबर 2009
दलित स्नेह
जबसे राहुल गाँधी ने उत्तर प्रदेश के एक गाँव में दलित के घर रात क्या गुजारी | कांग्रेसियों में दलित स्नेह उमर पड़ा है |
और हर कोई यह जाताना चाहता है की वह कितना दलित प्रेमी है और इस को प्रमाणित करने के लिए बाकायदा मिडिया में अपनी फोटो भी छपवा रहा है |
क्या गरीबों और दलितों के लिए यह वास्तविक प्रेम है या एक राजनैतिक दिखावा | क्योंकि यदि यहाँ पर वास्तव में उन लोगो की सुध लेने की बात होती तो शायद हर कोई अपने इस प्रेम का ढिंढोरा नही पिटता|
किसी व्यक्ति का अनुशरण करना एक बात है और नक़ल करना दूसरी बात | और यहाँ अनुशरण नही नक़ल हो रहा है | यह स्वयं को बस बडा दिखाने की बात है |
यदि आप किसी के लिए कुछ करना चाहते है तो यह आपको बताने की जरूरत नही है बल्कि कर दिखने की जरूरत है |
राहुल गाँधी निश्चय ही एक ऐसे व्यक्ति है जो कुछ कर दिखाना चाहते है ना की यह जताना की वह कुछ करना चाहते है |
आजादी से पहले हमारे देश में नेता किसी पार्टी विशेष के नही थे बल्कि देश के थे | और होना भी यही चाहिए |
राहुल गाँधी में भी एक ऐसे ही नेता की छवि झलक रही है जो किसी पार्टी विशेष का न होकर पूरे देश का होगा | और यदि करना है तो इनका अनुशरण करें न की नक़ल |
चुनाव के समय आने वाला दलित/गरीब मोह नेताओं के लिए बड़ा ही मोहिनी बाण है जो हर नेता इसे ब्रम्हास्त्र की तरह इस्तेमाल करता है | और यह सीधे निशाने पर लगता है |
इस बाण ने कई नेताओं को अरबपति बना दिया और जो इस बाण का सही इस्तेमाल करना नही जानते है वह इस राजनीती में कही नही टिकते है वास्तव में वे इस राजनीती पर बोझ हैं |
राजनीती के कुछ ऐसे गडरिये हैं जो हमेशा चुनाव के समय चिल्लातें है भेडिया आया भेडिया आया और आम जनता हर बार उनकी मदद(वोट) करने पहुच जाती है पर पता चलता है की वो भेडिया उस नेता के पास(जनता के सर्वांगी विकास ) उन्हें डराने अब पॉँच साल तक नही आने वाला है |
वास्तव में राजनेताओं का यही दलित प्रेम है |
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और हर कोई यह जाताना चाहता है की वह कितना दलित प्रेमी है और इस को प्रमाणित करने के लिए बाकायदा मिडिया में अपनी फोटो भी छपवा रहा है |
क्या गरीबों और दलितों के लिए यह वास्तविक प्रेम है या एक राजनैतिक दिखावा | क्योंकि यदि यहाँ पर वास्तव में उन लोगो की सुध लेने की बात होती तो शायद हर कोई अपने इस प्रेम का ढिंढोरा नही पिटता|
किसी व्यक्ति का अनुशरण करना एक बात है और नक़ल करना दूसरी बात | और यहाँ अनुशरण नही नक़ल हो रहा है | यह स्वयं को बस बडा दिखाने की बात है |
यदि आप किसी के लिए कुछ करना चाहते है तो यह आपको बताने की जरूरत नही है बल्कि कर दिखने की जरूरत है |
राहुल गाँधी निश्चय ही एक ऐसे व्यक्ति है जो कुछ कर दिखाना चाहते है ना की यह जताना की वह कुछ करना चाहते है |
आजादी से पहले हमारे देश में नेता किसी पार्टी विशेष के नही थे बल्कि देश के थे | और होना भी यही चाहिए |
राहुल गाँधी में भी एक ऐसे ही नेता की छवि झलक रही है जो किसी पार्टी विशेष का न होकर पूरे देश का होगा | और यदि करना है तो इनका अनुशरण करें न की नक़ल |
चुनाव के समय आने वाला दलित/गरीब मोह नेताओं के लिए बड़ा ही मोहिनी बाण है जो हर नेता इसे ब्रम्हास्त्र की तरह इस्तेमाल करता है | और यह सीधे निशाने पर लगता है |
इस बाण ने कई नेताओं को अरबपति बना दिया और जो इस बाण का सही इस्तेमाल करना नही जानते है वह इस राजनीती में कही नही टिकते है वास्तव में वे इस राजनीती पर बोझ हैं |
राजनीती के कुछ ऐसे गडरिये हैं जो हमेशा चुनाव के समय चिल्लातें है भेडिया आया भेडिया आया और आम जनता हर बार उनकी मदद(वोट) करने पहुच जाती है पर पता चलता है की वो भेडिया उस नेता के पास(जनता के सर्वांगी विकास ) उन्हें डराने अब पॉँच साल तक नही आने वाला है |
वास्तव में राजनेताओं का यही दलित प्रेम है |
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